14 सितंबर हिन्दी दिवस 2019 को और कैसे मनाएं ?

श्री महेश चन्द्र शर्मा
आज से ठीक 70 वर्ष पूर्व 14 सितंबर, 1949 के दिन संविधान सभा द्वारा हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा के रूप् में मान्यता दी गई थी। संविधान के निर्माताओं ने सोचा था कि अंग्रेजी का प्रयोग धीरे-धीरे कम करके भारतीय भाषाओं और हिन्दी का प्रयोग होने लगेगा, क्योंकि अंग्रेजी देश को दो हिस्सों में बांटती है। एक तो ऐसा वर्ग है जो अपने को आम जनता से अलग कर अंग्रेजी भक्त होने के कारण अपने को खास कहता है। दूसरा हिन्दी प्रेम आम जनता है। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय सम्मान और राष्ट्रीय एकता का माध्यम है। हिन्दी भाषा का साहित्य अत्यन्त ही समृद्ध है। हिन्दी ने राष्ट्र को एक समृद्ध इतिहास दिया है। हिन्दी में कबीर, सूर, तुलसीदास, रहीम, रसखान, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, हजार प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द आदि अनेक कवियों और लेखकों की परंपरा रही है।
राजभाषा और राष्ट्र की सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी को अकस्मात ही नहीं चुना गया, इसकी एक पृष्ठभूमि रही। 19वीं शताब्दी में स्वामी दयानन्द, केशव चन्द्र सेन, ईश्वर चंद विद्यासागर, बाल गंगाधर तिलक जैसे समाज सुधारकों ने इसे समस्त भारत के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में चुना था। इतिहास साक्षी है कि हिन्दी ने सम्पर्क और साहित्यिक भाषा के रूप में उत्तरी भारत ही नहीं मध्य भारत से आगे जाकर अपनी प्रभावशीलता को बढ़ाया और आज विश्व में सर्वाधिक समझी जाने वाली भाषा है। राष्ट्रीय आंदोलन में तो आगे जाकर महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डाॅ राजेन्द्र प्रसाद, राजर्षि टंडन, डाॅ रघुवीर, डाॅ लोहिया आदि ने हिन्दी को राष्ट्रीय आंदोलन का एक हिस्सा ही बना दिया था। उसके फलस्वरूप ही देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना व्याप्त हो गई थी। क्योंकि यह सच्चाई है कि अंग्रेजी के माध्यम से केवल कम प्रतिशत लोगों तक ही पहुंच हो सकती है, जबकि हिन्दी के माध्यम से राष्ट्र को एक सूत्र में बांध सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी सच्चाई है कि अंग्रेजी मानसिक गुलामी का प्रतीक है। मानसिक गुलामी से मुक्ति प्राप्त किए बिना हम सही अर्थों में स्वतंत्र भी नहीं हो सकते।
हिन्दी मातृभाषा ही नहीं है, इससे भारतीय संस्कृति का भविष्य भी जुड़ा हुआ है। क्योंकि अपनी भाषा और साहित्य के माध्यम से ही व्यक्ति को अपनी संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती है और संस्कृति के और सामाजिक मूल्यांे का पता चलता है। हिन्दी केवल भाषा ही नहीं, यह भारत का स्वत्व, अस्मिता और संस्कृति की प्रतीक भी है। समाज में चेतना जागरण का भाव, देशभक्ति का भाव, अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों का ज्ञान भाषा के माध्यम से ही दिया जा सकता है। हिन्दी वह भाषा है, जिसके माध्यम से हमने स्वतंत्रता आंदोलन को सारे देश में गुंजायमान किया और उसके संदेश को घर-घर तक पहुंचाया। हिन्दी ही हम सबाके एककता के सूत्र में बांध सकती है और समाज तथा राष्ट्र को समृद्धशाली बना सकती है।
राजभाषा हिन्दी को प्रोत्साहन देने के लिए और सरकारी कामकाज में राजभाषा हिन्दी के प्रति जागरूकता और उसके प्रयोग में गति लाने के लिए मंत्रालयों/विभागों/ कार्यालयों/ उपक्रमों/ बैंकों/ निगमों आदि में हर वर्ष सितम्बर माह में ‘हिन्दी पखवाड़ा’ आयोजित किया जाता है, नगर निगम उनमें प्रमुख हैं, क्योंकि इसका जनसंपर्क बहुत होता है। लेकिन यह आयोजन केवल एक दिखावा ही न बने, अतः अभी से इस ओर राजभाषा विभाग को योजना बनाने जैसे हिन्दी भाषा के उत्थान, हिन्दी और उसके प्रोत्साहन के लिए हिन्दी पखवाड़ा आरंभ होने से पूर्व अधिकारियों/ कर्मचारियों द्वारा हिन्दी में किए गए कार्यों की समीक्षा की जाए और उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों/ कर्मचारियों को पुरस्कृत किया जाए, जिससे दूसरों को प्रेरणा मिले। हिन्दी पखवाड़े के दौरान प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं, जिनका संबंध सरकारी कामकाज व्यवहार से हो। आईटी क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रतियोगिताओं में कंप्यूटर पर हिन्दी के प्रयोग संबंधी विषयों को भी जोड़ा जाए तथा जो कर्मचारी हिन्दी का प्रयोग नहीं कर पाते हैं, उन्हें इसका प्रशिक्षण दिया जाए। जो काम आॅनलाइन किए हैं, वे हिन्दी में हों।
हिन्दी पखवाड़े का मुख्य समारोह 14 सितंबर को या उसी पखवाड़े में ही आयोजित किया जाए। गत 14 सितंबर से आज तक पिछले एक वर्ष में राजभाषा में क्या प्रगति हुई, उसकी रिपोर्ट तैयार की जाए। मुख्य कार्यक्रम से पूर्व जो राजभाषा विभाग में पद रिक्त है, उन्हें भरा जाए या मंत्रालय के योग्य और हिन्दी में प्रवीण व्यक्तियों को प्रति नियुक्ति पर लेकर रिक्त पद किए जाएं। राजभाशा के पद खाली नहीं रहने चाहिए।
सरकारी कार्यालयों में जब तक हिन्दी टंकक व हिन्दी आशुलिपिक हिन्दी अनुवाद संबंधी निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिए जाते, तब तक उनमें केवल हिन्दी टंकक व हिन्दी आशुलिपिक ही भर्ती किए जाएं।
अनुवाद कार्य तथा राजभाषा नीति के कार्यान्वयन से जुड़े सभी अधिकारियों/कर्मचारियों को केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो में अनिवार्य अनुवाद प्रशिक्षण हेतु नामित किया जाए। ऐसे अधिकारियों/कर्मचारियों को भी अनुवाद के प्रशिक्षण पर नामित किया जा सकता है, जिन्हें स्नातक स्तर पर हिन्दी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं का ज्ञान हो तथा जिनकी सेवाओं का उपयोग कार्यालय द्वारा इस कार्य के लिए किया जा सकता है। नगर निगम में अभी भी अंग्रेजी का प्रभुत्व है उसमें बदल हो। हिन्दी शिक्षण योजना (मध्योत्तर), (हिन्दी टंकण/आशुलिपि प्रशिक्षण) गृहमंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा हर वर्ष हिन्दी शब्द संसाधन, हिन्दी टंकण एवं आशुलिपिक का प्रशिक्षण दिया जाता है। उसका लाभ उठाया जाए। हिन्दी क्रियान्वयन समिति का गठन किया जाए।
संविधान के अनुसार आज भारत की राजभाषा हिन्दी और अंग्रेजी सहायक भाषा है। कई कारणों से हिन्दी को उतना महत्व नहीं मिल पा रहा है, जितना उसके मिलना चाहिए। हम हिन्दी दिवस पर यह संकल्प लें कि हिन्दी को राजभाषा बनना है, साथ ही दूसरी प्रादेशिक भाषाओं का भी राष्ट्रीय स्तर के लिए विकसित करना है। तभी विदेशी भाषा अंग्रेजी से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए हिन्दी के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह राजभाषा के स्थान को ग्रहण करने के लिए ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को सशक्त अभिव्यक्ति देनेवाली भाषा के रूप में अपने में उर्जा पैदा करें। इसके लिए आप जैसे हिन्दी प्रेमियों, हिन्दी सेवियों, हिन्दी लेखकों और साहित्यकारों को निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में विकसित किया जाए और इसे आम जनता तक पहुंचाया जाए।
हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हिन्दी केवल बोलचाल की भाषा बनने तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि यह आम आदमी की व्यवहारिक, अदालती और सरकारी कार्यों आदेश, निर्देश की भाषा बननी चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अपने सरकारी विभाग में हिन्दी को राजभाषा नियम 2003 के अनुसार अपनायें। अपने कार्यालयों, संस्थान के समस्त पत्राचार, निमंत्रण पत्र, आवेदन, नाम पट्टों और सार्वजनिक कार्यों में राजभाषा हिन्दी को प्रयोग करें। हिन्दी में सोचें, हिन्दी में लिखें। हिन्दी को केवल हम अनुवाद की भाषा ही बनाकर नहीं चलें। जब हम मूल रूप में हिन्दी में सोचने, समझने और लिखने की आदत डालेंगे और हिन्दी को हमें आवश्यकता क्यों है, इस बात को समझेंगे और अन्य लोगों को समझायेंगे, तब ही हिन्दी दिवस सार्थक होगा।
हमें आशा है कि आप इस राष्ट्रीय पर्व को उत्साह से मनवाकर हिन्दी को अपने मंत्रालय विभाग में प्रोत्साहन देने का संकल्प लेंगे।
(लेखक दिल्ली के पूर्व महापौर रह चुके हैं। वर्तमान में दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष हैं। वर्ष 1967 में हिन्दी एक्ट के लिए बनी समिति के सदस्य रहे हैं।)
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