शनिवार, 13 जून 2026
Close
टॉप स्टोरीज संपूर्ण भारत

क्या है पान्चजन्य?

क्या है पान्चजन्य?
  • PublishedSeptember , 2019

टीम हिन्दी

यदि आज आपसे कोई पूछे कि पान्चजन्य क्या है? तो कुछ देर के लिए अधिकतर लोग साप्ताहिक पत्रिका का लेंगे। हो सकता है कई लोगों के दिमाग में भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय शंख पान्चजन्य का भी नाम आए।

बता दें कि स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद 14 जनवरी, 1948 को मकर संक्राति के पावन पर्व पर अपने आवरण पृष्ठ पर भगवान श्रीकृष्ण के मुख से शंखनाद के साथ अटल बिहारी वाजपेयी के संपादकत्व में ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक का अवतरण स्वाधीन भारत में स्वाधीनता आन्दोलन के प्रेरक आदशोंर् एवं राष्ट्रीय लक्ष्यों का स्मरण दिलाते रहने के संकल्प का उद्घोष ही था।

अटल जी के बाद ‘पाञ्चजन्य’ के सम्पादक पद को सुशोभित करने वालों की सूची में सर्वश्री राजीवलोचन अग्निहोत्री, ज्ञानेन्द्र सक्सेना, गिरीश चन्द्र मिश्र, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, तिलक सिंह परमार, यादव राव देशमुख, वचनेश त्रिपाठी, केवल रतन मलकानी, देवेन्द्र स्वरूप, दीनानाथ मिश्र, भानुप्रताप शुक्ल, रामशंकर अग्निहोत्री, प्रबाल मैत्र, तरुण विजय, बल्देव भाई शर्मा और हितेश शंकर जैसे नाम आते हैं। नाम बदले होंगे पर ‘पाञ्चजन्य’ की निष्ठा और स्वर में कभी कोई परिवर्तन नहीं आया, वे अविचल रहे।

राष्ट्रीय चेतना की जिस भावभूमि से ‘पाञ्चजन्य’ का जन्म हुआ, स्वाधीन भारत की भौगोलिक अखंडता एवं सुरक्षा, उसकी सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करते हुए उसे ससम्मान श्रेष्ठ सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के आधार पर युगानुकूल सवांर्गीण पुनर्रचना के पथ पर आगे ले जाने के जिस संकल्प को लेकर ‘पाञ्चजन्य’ ने अपनी जीवन यात्रा आरम्भ की थी, वह आज पूरी शक्ति के साथ अपने उसी कर्त्तव्य पथ पर डटा हुआ है।

पाञ्चजन्य भगवान विष्णु का शंख है। विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण पाञ्चजन्य नामक एक शंख रखते थे ऐसा वर्णन महाभारत में प्राप्त होता है। श्रीमद्भगवद्गीता जो कि महाभारत का अङ्ग है उस में वासुदेव द्वारा कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया जाना बताया गया है। भागवत पुराण के अनुसार सान्दीपनी ऋषि के आश्रम में कृष्ण की शिक्षा पूरी होने पर उन्हें गुरू दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने कहा समुद्र में डूबे हुये मेरे पुत्र को ले आओ। श्री कृष्ण द्वारा समुद्र तट पर जाकर शंखासुर को मारने पर उसका खोल (शंख) शेष रह गया था। उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। शायद उसी शंख का नाम पाञ्चजन्य था।

पौराणिक कथा के अनुसार, कृष्ण और बलराम शिक्षा ग्रहण करने के लिए महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहे थे। जहाँ उन्होंने वेद, पुराण तथा उपनिषद आदि का ज्ञान प्राप्त किया। और जब शिक्षा पूर्ण हुई तब उन्होंने गुरुदेव से दक्षिणा मांगने के लिए प्रार्थना की। महर्षि सांदीपनि को ज्ञात था कि कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र पुनर्दत्त, जिसकी समुद्र में डूब जाने के कारण मृत्यु हो चुकी थी, को लौटाने की दक्षिणा मांगी। गुरु की आज्ञा लेकर श्री कृष्ण बलराम सहित समुद्र तट पर पहुंचे और समुद्र देवता से गुरु पुत्र को लौटने की प्रार्थना की। किन्तु समुद्र देव से कोई उत्तर नहीं मिला। तब कृष्ण ने क्रोधित होकर सम्पूर्ण समुद्र को सुखाने की चेतावनी दी, और इस भय से सागर देवता प्रकट हुए। उन्होंने कृष्ण के आगे हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया, और बताया कि महर्षि का पुत्र सागर में नहीं है। किन्तु साथ ही उन्होंने आशंका उतपन्न की कि सागर तल में एक असुर, जिसका नाम पंचजन था, रहता है।

पंचजन शंखासुर नाम से प्रसिद्द था और वह मनुष्य को अपना भोजन बनाकर खा लेता था। सागर देव ने कहा हो सकता है की उसी ने गुरु पुत्र को अपना निवाला बना लिया हो। यह सुन कृष्ण और बलराम सागर के तल में उतर गए, और शंखासुर की खोज की। उन्होंने उस से गुरुपुत्र के विषय में पूछा, किन्तु उसने बताने से मना कर दिया और कृष्ण को भी मारने के लिए आगे बढ़ा।

किन्तु श्री कृष्ण ने उसका वध कर दिया। उसके मरने पर उन्होंने उसका पेट चीर दिया, किन्तु उन्हें वहां कोई बालक नहीं मिला। वहा पर उन्हें एक शंख मिला जिसे कृष्ण ने ले लिया और यमलोक की तरफ प्रस्थान किया। यमलोक पहुंच कर यमदूतों द्वारा उन्हें रोका गया तो कृष्ण ने शंखनाद किया। वह शंखनाद इतना भयानक था की सम्पूर्ण यमलोक कम्पित हो गया। तब यमराज उनके सामने उपस्थित हुए और प्रभु की आज्ञा मान कर उन्होंने गुरुपुत्र को वापस कर दिया।

kya hai panchjanay

Written By
टीम द हिन्दी

2 Comments

  • I do agree with all the ideas you have presented in your post. They’re really convincing and will definitely work. Still, the posts are very short for beginners. Could you please extend them a little from next time? Thanks for the post.

  • Admiring the dedication you put into your blog and detailed information you offer. It’s awesome to come across a blog every once in a while that isn’t the same outdated rehashed material. Excellent read! I’ve saved your site and I’m including your RSS feeds to my Google account.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *