बंकिमचंद्र चटर्जी : जिन्होंने साहित्य और समाज को दी नयी दिशा

टीम हिन्दी
बंकिमचन्द्र एक महान् साहित्यकार ही नहीं, वरन् एक देशभक्त भी थे. देशभक्ति एवं मातृभूमि के प्रति उनकी सेवा भावना ने ही उनके साहित्यकार व्यक्तित्व को पूर्णता दी. आनन्दमठ के माध्यम से देश के कोने-कोने में देशभक्ति व वन्देमातरम् का जयघोष करने वाले बंकिम एक महान देशभक्त थे. उनकी देशभक्ति एवं स्वाभिमान का उदाहरण कर्नल डफिन पर काले भारतीय का अपमान करने के एवज में दावा ठोकना था. उस अधिकारी को उन्होंने माफी मांगने पर मजबूर कर दिया था.
सरकारी नौकरी पर रहते हुए बंकिम ने बड़खोली गांव पर धावा बोलने वाले अंग्रेज लुटेरों का दमन किया. उनमें से 25 को काला पानी, एक को फांसी की सजा तक सुनायी. इसके एवज में मिलने वाली जान से मारने की धमकी से वे जरा भी भयभीत नहीं हुए. अपनी योग्यता और सूझबूझ से वे हमेशा अंग्रेजों का विरोध करते हुए देशभक्ति के लिए समर्पित रहे. बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने वन्देमातरम् के माध्यम से राष्ट्रीयता के जो जागृति भरे संस्कार गुलाम भारतीयों को दिये, उनके लिए भारतवासी उनके सदा ऋणी रहेंगे.
19वीं शताब्दी के बंगाल के प्रकाण्ड विद्वान् तथा महान् कवि और उपन्यासकार थे. 1874 में प्रसिद्ध देश भक्ति गीत वन्देमातरम् की रचना की जिसे बाद में आनन्द मठ नामक उपन्यास में शामिल किया गया. ध्यातव्य है कि वन्देमातरम् गीत को सबसे पहले 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था. बंकिमचंद्र का जन्म उस काल में हुआ जब बंगला साहित्य का न कोई आदर्श था और न ही रूप या सीमा का कोई विचार. वन्दे मातरम राष्ट्रगीत के रचयिता होने के नाते वे बड़े सम्मान के साथ सदा याद किए जायेंगे. उनकी शिक्षा बंगला के साथ-साथ अंग्रेजी व संस्कृत में भी हुई थी. आजीविका के लिए उन्होंने सरकारी सेवा की, परन्तु राष्ट्रीयता और स्वभाषा प्रेम उनमं कूट-कूट कर भरा हुआ था. युवावस्था में उन्होंने अपने एक मित्र का अंग्रेजी में लिखा हुआ पत्र बिना पढ़े ही इस टिप्पणी के साथ लौटा दिया था कि, अंग्रेजी न तो तुम्हारी मातृभाषा है और न ही मेरी. सरकारी सेवा में रहते हुए भी वे कभी अंग्रेजों से दबे नहीं.
बंगला भाषा के प्रसिद्ध लेखक बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म 26 जून, 1838 ई. को बंगाल के 24 परगना जिले के कांठल पाड़ा नामक गाँव में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था. बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय बंगला के शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं. उनकी लेखनी से बंगला साहित्य तो समृद्ध हुआ ही है, हिन्दी भी उपकृत हुई है। वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे. वे भारत के एलेक्जेंडर ड्यूमा माने जाते हैं. इन्होंने 1865 में अपना पहला उपन्यास दुर्गेश नन्दिनी लिखा.
बंकिम के दूसरे उपन्यास कपाल कुण्डली, मृणालिनी, विषवृक्ष, कृष्णकांत का वसीयत नामा, श्रजनी, चन्द्रशेखर आदि प्रकाशित हुए. राष्ट्रीय दृष्टि से आनंदमठ उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है. इसी में सर्वप्रथम वन्दे मातरम् गीत प्रकाशित हुआ था. ऐतिहासिक और सामाजिक तानेबाने से बुने हुए इस उपन्यास ने देश में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने में बहुत योगदान दिया. लोगों ने यह समझ लिया कि विदेशी शासन से छुटकारा पाने की भावना अंग्रेजी भाषा या यूरोप का इतिहास पढ़ने से ही जागी. इसका प्रमुख कारण था अंग्रेजों द्वारा भारतीयों का अपमान और उन पर तरह-तरह के अत्याचार. बंकिम के दिए ‘वन्दे मातरम्’ मंत्र ने देश के सम्पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम को नई चेतना से भर दिया. एक ओर विदेशी सरकार की सेवा और दूसरी ओर देश के नवजागरण के लिए उच्चकोटि के साहित्य की रचना करना यह काम बंकिम के लिए ही सम्भव था.
आधुनिक बंगला साहित्य के राष्ट्रीयता के जनक इस नायक का 8 अप्रैल, 1894 ई. को देहान्त हो गया. रबीन्द्रनाथ ने एक स्थान पर कहा है- राममोहन ने बंग साहित्य को निमज्जन दशा से उन्नत किया, बंकिम ने उसके ऊपर प्रतिभा प्रवाहित करके स्तरबद्ध मूर्ति का अपसरित कर दी. बंकिम के कारण ही आज बंगभाषा मात्र प्रौढ़ ही नहीं, उर्वरा और शस्यश्यामला भी हो सकी है.
Bankimchandra Chatterjee
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